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जब रक्षक ही भक्षक बनने लगें; उत्तराखंड पुलिस के दो अफसरों की विवादित कहानी।



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उत्तराखंड में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की सरकार एक ओर ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति के तहत अपराधियों पर शिकंजा कस रही है, वहीं राज्य के कुछ ‘बेलगाम’ आईपीएस अधिकारी सरकार की छवि धूमिल करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। डीजीपी दीपम सेठ के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद, पुलिस महकमे के भीतर अनुशासनहीनता का ऐसा नंगा नाच देखने को मिल रहा है जिसने पूरे विभाग को असहज कर दिया है।

केस नंबर 1: वर्दी का अपमान और बलि का बकरा

गणतंत्र दिवस जैसे पावन राष्ट्रीय पर्व पर जहां पूरा देश तिरंगे को सलामी देता है, वहां उत्तराखंड के एक ‘ऑल इंडिया सर्विस’ के अधिकारी ने मर्यादाओं की धज्जियां उड़ा दीं। यह अधिकारी परेड में ऐसी वर्दी पहनकर पहुंचे जो निर्धारित मानकों (Adhomanak) के अनुरूप नहीं थी। जब सोशल मीडिया और विभाग में इसकी थू-थू हुई, तो अधिकारी ने अपनी गलती मानने के बजाय सारा ठीकरा अपने अधीनस्थ ‘पेशकार’ पर फोड़ दिया और उसे निलंबित करवा दिया। इस कदम से निचले स्तर के कर्मचारियों में भारी रोष है।

केस नंबर 2: ड्यूटी से नदारद और बर्बरता की हद

दूसरा मामला एक ऐसे चर्चित आईपीएस अधिकारी का है, जिन्होंने 26 जनवरी की किसी भी आधिकारिक परेड में हिस्सा न लेकर एक नकारात्मक रिकॉर्ड कायम कर दिया है। जानकारों की मानें तो यह ‘सर्विस कंडक्ट रूल्स’ का सीधा उल्लंघन है, जिसकी सजा सेवा से बर्खास्तगी तक हो सकती है। चर्चाएं यहीं खत्म नहीं होतीं; सूत्रों के अनुसार, इसी अधिकारी ने एक कथित आरोपी को क्रिकेट बैट से इतनी बेरहमी से पीटा कि उसकी जान पर बन आई। अगर मौके पर मौजूद विभाग के अन्य लोग दखल न देते, तो शायद कोई अनहोनी हो जाती।

सरकार की साख दांव पर

सवाल यह उठता है कि क्या मुख्यमंत्री धामी का डंडा केवल छोटे कर्मचारियों पर चलेगा या इन रसूखदार अधिकारियों की फाइलें भी खोली जाएंगी? अगर पुलिस के शीर्ष अधिकारी ही वर्दी और कानून का सम्मान नहीं करेंगे, तो जनता के बीच क्या संदेश जाएगा? फिलहाल, गृह विभाग और पुलिस मुख्यालय की चुप्पी कई संदेहों को जन्म दे रही है।


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