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राजपरिवार और हक-हकूक धारकों के अधिकार सुरक्षित रखने की मांग

देहरादून में आयोजित तीर्थ विधान परिषद की महत्वपूर्ण बैठक में उत्तराखंड के प्रमुख धार्मिक स्थलों की परंपराओं, ऐतिहासिक विरासत और हक-हकूक की सुरक्षा को लेकर कई महत्वपूर्ण प्रस्ताव पारित किए गए। परिषद ने बदरीनाथ, केदारनाथ सहित उनसे जुड़े 85 मंदिरों की धार्मिक पहचान और सदियों पुरानी परंपराओं को अक्षुण्ण बनाए रखने की आवश्यकता पर बल दिया। बैठक में उपस्थित वक्ताओं ने कहा कि उत्तराखंड की सांस्कृतिक और धार्मिक धरोहर केवल राज्य की ही नहीं बल्कि पूरे देश की अमूल्य विरासत है, जिसके संरक्षण के लिए ठोस और संवेदनशील कदम उठाए जाने चाहिए।

बैठक की अध्यक्षता ठाकुर भवानी प्रताप सिंह पंवार ने की। इस दौरान थातराजगुरु आचार्य डॉ. कृष्णानन्द नौटियाल ने कहा कि बदरीनाथ और केदारनाथ मंदिरों की व्यवस्थाओं का संचालन वर्ष 1924 के अधिनियम की मूल भावना के अनुरूप किया जाना चाहिए। परिषद का मानना है कि मंदिरों से जुड़े प्रशासनिक निर्णयों और विकास कार्यों में धार्मिक परंपराओं, स्थानीय रीति-रिवाजों और ऐतिहासिक व्यवस्थाओं का सम्मान सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। परिषद ने यह भी चिंता व्यक्त की कि आधुनिक विकास परियोजनाओं के चलते कहीं मंदिरों की धार्मिक गरिमा और ऐतिहासिक पहचान प्रभावित न हो जाए। सदस्यों ने सुझाव दिया कि तीर्थ क्षेत्रों में होने वाले सभी विकास कार्य स्थानीय मान्यताओं, धार्मिक परंपराओं और सांस्कृतिक मूल्यों को ध्यान में रखकर किए जाएं ताकि आस्था और विकास के बीच संतुलन बना रहे।

बैठक में गढ़वाल राजपरिवार तथा स्थानीय हक-हकूक धारकों के अधिकारों की सुरक्षा का मुद्दा भी प्रमुखता से उठाया गया। परिषद ने सरकार से मांग की कि सदियों से चली आ रही व्यवस्थाओं, अधिकारों और जिम्मेदारियों को सुरक्षित रखा जाए। परिषद का मानना है कि इन व्यवस्थाओं का संरक्षण उत्तराखंड की धार्मिक परंपराओं और सांस्कृतिक पहचान को बनाए रखने के लिए अत्यंत आवश्यक है। स्थानीय श्रद्धालुओं और निवासियों को मंदिर दर्शन तथा धर्मशालाओं में प्राथमिकता दिए जाने का प्रस्ताव भी बैठक में रखा गया। परिषद का कहना है कि स्थानीय समाज सदियों से इन तीर्थ स्थलों की सेवा, संरक्षण और व्यवस्थाओं का अभिन्न हिस्सा रहा है, इसलिए उनके हितों का विशेष ध्यान रखा जाना चाहिए।

बैठक में आगामी हरिद्वार कुंभ, पारंपरिक धार्मिक अनुष्ठानों और गढ़वाल राजवंश से जुड़ी धार्मिक व्यवस्थाओं पर भी विस्तृत चर्चा की गई। इसके साथ ही गढ़वाल और कुमाऊं क्षेत्र में स्थित ऐतिहासिक मंदिरों, महलों और धरोहरों के संरक्षण तथा उनके व्यवस्थित दस्तावेजीकरण की आवश्यकता पर बल दिया गया। परिषद ने उन प्राचीन मंदिर समूहों का मुद्दा भी उठाया जो वर्तमान में वन विभाग के अधिकार क्षेत्र में आते हैं। सदस्यों ने सुझाव दिया कि ऐसे मंदिरों की धार्मिक परंपराओं, पूजा-पद्धतियों और पारंपरिक अधिकार क्षेत्रों में अनावश्यक प्रशासनिक हस्तक्षेप से बचा जाए तथा उनकी ऐतिहासिक और धार्मिक पहचान को सुरक्षित रखा जाए। बैठक में मौजूद सभी वक्ताओं ने उत्तराखंड की धार्मिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत के संरक्षण के लिए सामूहिक प्रयासों की आवश्यकता पर जोर दिया। उनका कहना था कि आने वाली पीढ़ियों के लिए इन अमूल्य धरोहरों को सुरक्षित रखना समाज और सरकार दोनों की साझा जिम्मेदारी है।

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