
भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण (AAI) अब पायलट प्रशिक्षण के क्षेत्र में भी बड़ी भूमिका निभाने की तैयारी कर रहा है। अब तक देश में हवाई अड्डों के विकास और संचालन की जिम्मेदारी निभाने वाला प्राधिकरण पहली बार अपने एयरपोर्ट नेटवर्क पर पायलट प्रशिक्षण से जुड़ा आधुनिक बुनियादी ढांचा विकसित करेगा। इस पहल का उद्देश्य देश में प्रशिक्षित कमर्शियल पायलटों की बढ़ती मांग को पूरा करना और विमानन क्षेत्र को नई मजबूती देना है। नई योजना के तहत एएआई अपने चयनित हवाई अड्डों पर फुल फ्लाइट सिम्युलेटर और टाइप रेटिंग ट्रेनिंग ऑर्गेनाइजेशन स्थापित करेगा। इसके लिए विस्तृत कार्ययोजना तैयार करने और परियोजना की व्यवहार्यता का आकलन करने हेतु कंसल्टेंट नियुक्त करने की प्रक्रिया भी शुरू कर दी गई है। इससे देश में आधुनिक पायलट प्रशिक्षण सुविधाओं का विस्तार होगा।
अब तक टाइप रेटिंग और फ्लाइट सिम्युलेटर आधारित प्रशिक्षण का अधिकांश हिस्सा निजी कंपनियों के पास रहा है। एएआई के इस कदम से पहली बार सरकारी क्षेत्र भी इस महत्वपूर्ण प्रशिक्षण व्यवस्था का हिस्सा बनेगा। इससे प्रशिक्षण सुविधाओं की संख्या बढ़ेगी और भविष्य में अधिक पायलटों को देश में ही उच्च स्तरीय प्रशिक्षण मिल सकेगा। टेंडर दस्तावेज के अनुसार, इस परियोजना का लक्ष्य ऐसा टिकाऊ बिजनेस मॉडल तैयार करना है, जिससे एएआई अपने एयरपोर्ट नेटवर्क का बेहतर उपयोग करते हुए तेजी से बढ़ रहे एविएशन ट्रेनिंग बाजार में प्रभावी भागीदारी निभा सके। कंसल्टेंट देश में वर्तमान और भविष्य की पायलट मांग का अध्ययन करने के साथ उपयुक्त एयरपोर्ट का चयन, आवश्यक बुनियादी ढांचे का आकलन, साझेदारी मॉडल और वित्तीय योजना भी तैयार करेगा।
यह पहल ऐसे समय में सामने आई है जब भारत में कमर्शियल पायलटों की मांग लगातार बढ़ रही है। नागरिक उड्डयन मंत्रालय के अनुसार, वर्तमान में देश में 10,261 वैध एयरलाइन ट्रांसपोर्ट पायलट लाइसेंस धारक हैं, जबकि आने वाले 15 से 20 वर्षों में भारतीय एयरलाइंस के बेड़े में 1,700 से अधिक नए विमान शामिल होने की संभावना है। इनके संचालन के लिए लगभग 30,000 प्रशिक्षित पायलटों की आवश्यकता होगी। इसी बढ़ती जरूरत को ध्यान में रखते हुए केंद्र सरकार पायलट प्रशिक्षण केंद्रों, फ्लाइंग ट्रेनिंग ऑर्गेनाइजेशन और फ्लाइट सिम्युलेटर आधारित प्रशिक्षण सुविधाओं का तेजी से विस्तार करने पर जोर दे रही है। एएआई की यह पहल देश के विमानन क्षेत्र में आत्मनिर्भरता बढ़ाने और भविष्य की जरूरतों को पूरा करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।