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देहरादून:- राज्यसभा सांसद और उत्तराखंड भाजपा प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट ने हाल में नीती घाटी में आई आपदा से हुए नुकसान और हिमालयी क्षेत्रों की बढ़ती प्राकृतिक चुनौतियों का मुद्दा संसद में उठाया। उन्होंने केंद्र सरकार से उत्तराखंड समेत पूरे हिमालयी क्षेत्र के लिए ‘राष्ट्रीय हिमालयी आपदारोधी अवसंरचना मिशन’ शुरू करने का सुझाव दिया।
राज्यसभा में अपने वक्तव्य के दौरान भट्ट ने कहा कि हिमालयी राज्यों में प्राकृतिक आपदाओं की बढ़ती घटनाओं को देखते हुए अब पारंपरिक आपदा प्रबंधन व्यवस्था से आगे बढ़ने की जरूरत है। उन्होंने पूर्व चेतावनी प्रणाली, सुरक्षित बुनियादी ढांचे और वैज्ञानिक आपदा प्रबंधन को एकीकृत करने पर जोर दिया।
नीती घाटी आपदा से सामने आई हिमालय की चुनौती
महेंद्र भट्ट ने कहा कि 10 अगस्त को चमोली की नीती घाटी के तमक क्षेत्र में बादल फटने और भारी जलप्रवाह से जनजीवन और संपर्क व्यवस्था प्रभावित हुई। इस घटना ने एक बार फिर हिमालयी क्षेत्रों की संवेदनशीलता को सामने ला दिया है। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड में बादल फटना, अचानक बाढ़, भूस्खलन और अत्यधिक बारिश अब अलग-अलग घटनाओं के तौर पर नहीं देखी जा सकतीं। पर्वतीय क्षेत्रों की भौगोलिक परिस्थितियों और मौसम में तेजी से हो रहे बदलावों का असर सड़क, पुल, बिजली, पेयजल, संचार व्यवस्था और स्थानीय आजीविका पर पड़ रहा है।
हर संवेदनशील घाटी और जलधारा की हो वैज्ञानिक मैपिंग
भट्ट ने केंद्र सरकार से मांग की कि प्रस्तावित राष्ट्रीय हिमालयी आपदारोधी अवसंरचना मिशन के तहत संवेदनशील घाटियों, नदियों और नालों की वैज्ञानिक हैजार्ड मैपिंग कराई जाए। उन्होंने कहा कि संभावित आपदा वाले क्षेत्रों की पहले से पहचान होने पर राहत और बचाव कार्यों को अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है। साथ ही बाढ़, भूस्खलन और बादल फटने जैसी घटनाओं के जोखिम को कम करने के लिए उसी आधार पर बुनियादी ढांचे की योजना तैयार की जानी चाहिए।
गांवों तक पहुंचे रियल टाइम अर्ली वार्निंग सिस्टम
राज्यसभा सांसद ने मांग की कि बादल फटने, फ्लैश फ्लड और भूस्खलन जैसी घटनाओं के लिए रियल टाइम अर्ली वार्निंग सिस्टम को ग्राम स्तर तक पहुंचाया जाए। इससे संवेदनशील इलाकों में रहने वाले लोगों को समय रहते सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया जा सकेगा। उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि हिमालयी परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए सड़कों, पुलों, सुरंगों और पेयजल प्रणालियों का निर्माण आपदारोधी डिजाइन के आधार पर किया जाए।
दुर्गम इलाकों में स्थायी आपदा प्रतिक्रिया केंद्र बनाने की मांग
महेंद्र भट्ट ने सीमावर्ती और दूरदराज के पर्वतीय क्षेत्रों में BRO, SDRF, NDRF और स्थानीय प्रशासन के लिए स्थायी त्वरित आपदा प्रतिक्रिया केंद्र स्थापित करने पर भी जोर दिया। उनका कहना है कि आपदा के समय शुरुआती कुछ घंटे बेहद महत्वपूर्ण होते हैं, इसलिए स्थानीय स्तर पर ही पर्याप्त संसाधन और प्रशिक्षित टीमें उपलब्ध रहनी चाहिए।
चारधाम यात्रा और पर्यटन के लिए डिजिटल व्यवस्था पर जोर
भट्ट ने उत्तराखंड में बढ़ते चारधाम पर्यटन और यात्रा दबाव का भी मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि पर्वतीय क्षेत्रों में बढ़ती आवाजाही को देखते हुए यात्रियों और पर्यटकों की आवाजाही को वैज्ञानिक और डिजिटल प्रणाली के माध्यम से व्यवस्थित करने की जरूरत है। इसके तहत मौसम, सड़क की स्थिति, भूस्खलन के खतरे और यातायात क्षमता जैसी सूचनाओं के आधार पर यात्रा प्रबंधन को अधिक सुरक्षित और प्रभावी बनाया जा सकता है।