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राम मंदिर ट्रस्ट की कार्यप्रणाली पर उठे गंभीर सवाल

राम मंदिर में चढ़ावे की कथित चोरी और वित्तीय अनियमितताओं को लेकर गठित विशेष जांच टीम (एसआईटी) ने अपनी प्रारंभिक जांच रिपोर्ट उत्तर प्रदेश शासन को सौंप दी है। रिपोर्ट सामने आने के बाद इस पूरे मामले ने नया मोड़ ले लिया है। सूत्रों के अनुसार जांच में चढ़ावे की राशि के कथित गबन, कमीशनखोरी, नियुक्तियों में अनियमितताओं और धन गणना प्रक्रिया में संभावित हेरफेर से जुड़े कई महत्वपूर्ण बिंदुओं का उल्लेख किया गया है। रिपोर्ट अब शासन के माध्यम से मुख्यमंत्री के समक्ष रखी जाएगी, जिसके बाद आगे की कार्रवाई को लेकर निर्णय लिया जा सकता है।

मंगलवार सुबह एसआईटी के सदस्य लखनऊ मंडलायुक्त विजय विश्वास पंत, आईजी रेंज किरण एस और विशेष सचिव वित्त नील रतन ने अपर मुख्य सचिव गृह संजय प्रसाद को गोपनीय रिपोर्ट सौंपी। जांच टीम ने रिपोर्ट में कई दस्तावेजी साक्ष्य, गवाहों के बयान और वित्तीय प्रक्रियाओं से जुड़े तथ्यों को शामिल किया है। बताया जा रहा है कि रिपोर्ट में मंदिर प्रशासन और चढ़ावे की निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठाए गए हैं। कुछ पदाधिकारियों की भूमिका की भी जांच के दायरे में चर्चा की गई है, जबकि कुछ अधिकारियों और कर्मचारियों को निगरानी में लापरवाही का जिम्मेदार बताया गया है।

सूत्रों के मुताबिक जांच रिपोर्ट में राम मंदिर ट्रस्ट से जुड़े कुछ प्रमुख नामों का भी उल्लेख किया गया है। इनमें महासचिव चंपत राय, ट्रस्ट सदस्य अनिल मिश्रा और निर्माण कार्यों से जुड़े गोपाल राव का नाम चर्चा में बताया जा रहा है। इसके अलावा कुछ रिश्तेदारों और करीबी सहयोगियों के संदर्भ भी रिपोर्ट में दर्ज किए गए हैं। एसआईटी का मानना है कि नियुक्तियों और वित्तीय गतिविधियों में कुछ लोगों का प्रभाव अपेक्षा से अधिक रहा, जिसकी वजह से निगरानी तंत्र कमजोर हुआ और कथित अनियमितताओं को बढ़ावा मिला।

जांच में यह भी संकेत मिले हैं कि चढ़ावे की राशि के प्रबंधन में लगभग 25 से 30 लोगों की प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष भूमिका हो सकती है। रिपोर्ट में कुछ व्यक्तियों पर कथित कमीशनखोरी के आरोपों का भी उल्लेख किया गया है। हालांकि एसआईटी ने स्पष्ट किया है कि यह प्रारंभिक रिपोर्ट है और विस्तृत जांच अभी जारी है। अगले दो सप्ताह में विस्तृत जांच रिपोर्ट तैयार होने के बाद और अधिक तथ्य सामने आने की संभावना जताई जा रही है।

जांच के दौरान यह आरोप भी सामने आया कि मंदिर में आने वाली दान राशि के प्रबंधन में लंबे समय तक अनियमितताएं होती रहीं। विशेष रूप से महाकुंभ और माघ मेले जैसे अवसरों पर जब बड़ी संख्या में श्रद्धालु अयोध्या पहुंचे और चढ़ावे में भारी बढ़ोतरी हुई, तब कथित रूप से गिनती प्रक्रिया के दौरान रकम में हेरफेर किए जाने की आशंका जताई गई। सूत्रों के अनुसार कुछ मौकों पर प्रतिदिन लाखों रुपये तक की राशि गायब होने के संकेत जांच में मिले हैं, हालांकि वास्तविक आंकड़ों की पुष्टि विस्तृत जांच के बाद ही हो सकेगी।

एसआईटी की जांच में नियुक्ति प्रक्रिया को भी एक अहम कारण माना गया है। बताया जा रहा है कि चढ़ावे की गणना का कार्य एक आउटसोर्सिंग व्यवस्था के तहत संचालित किया जा रहा था, लेकिन कर्मचारियों के चयन में पारदर्शिता को लेकर सवाल खड़े हुए हैं। जांच में यह भी सामने आया कि कुछ प्रभावशाली लोगों की सिफारिश पर बड़ी संख्या में परिचित और रिश्तेदार नियुक्त किए गए थे। इससे निगरानी और जवाबदेही की प्रक्रिया प्रभावित हुई।

कथित गड़बड़ी का सबसे महत्वपूर्ण पहलू चढ़ावे की गणना प्रक्रिया को माना जा रहा है। जांच में यह आशंका जताई गई है कि दानपात्रों से निकाली गई पूरी राशि को पहले एकत्रित किया जाता था और उसके बाद गिनती होती थी। इस व्यवस्था में शुरुआती कुल राशि का स्पष्ट रिकॉर्ड नहीं होने के कारण गिनती के दौरान कथित हेरफेर की गुंजाइश बनी रहती थी। एसआईटी अब इस प्रक्रिया की तकनीकी और प्रशासनिक दोनों स्तरों पर समीक्षा कर रही है।

रिपोर्ट सामने आने के बाद राम मंदिर ट्रस्ट की कार्यप्रणाली और वित्तीय पारदर्शिता को लेकर बहस तेज हो गई है। शासन स्तर पर अब रिपोर्ट का परीक्षण किया जाएगा और यदि जांच में आरोपों की पुष्टि होती है तो संबंधित व्यक्तियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई के साथ-साथ प्रशासनिक बदलाव भी किए जा सकते हैं। फिलहाल सभी की निगाहें एसआईटी की विस्तृत रिपोर्ट पर टिकी हैं, जो इस पूरे मामले की दिशा तय कर सकती है।

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