भारतीय युवाओं में विदेश जाकर पढ़ाई करने का रुझान अब धीरे-धीरे कम होता नजर आ रहा है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, 2023 में करीब 9.08 लाख भारतीय छात्र पढ़ाई के लिए विदेश गए थे, जबकि 2026 में यह संख्या घटकर करीब 5.66 लाख रह गई। यानी तीन वर्षों में विदेश जाने वाले छात्रों की संख्या में लगभग 40 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है। हालांकि, विदेशों में पढ़ाई कर रहे भारतीय छात्रों की कुल संख्या अभी भी काफी बड़ी है। मौजूदा समय में करीब 18.8 लाख भारतीय छात्र अलग-अलग देशों में शिक्षा हासिल कर रहे हैं। ऐसे में नए छात्रों के विदेश जाने की घटती संख्या को शिक्षा और करियर से जुड़े बदलते फैसलों का संकेत माना जा रहा है। विदेश में पढ़ाई के लिए छात्रों की पहली पसंद रहे कनाडा, ब्रिटेन और अमेरिका जैसे देशों में नियमों में बदलाव इसका एक बड़ा कारण माना जा रहा है। कनाडा ने स्टडी परमिट और वर्क परमिट को लेकर नियम सख्त किए हैं। ब्रिटेन ने अंतरराष्ट्रीय छात्रों के आश्रितों से जुड़े नियमों में बदलाव किया है, जबकि अमेरिका में छात्र वीजा प्रक्रिया को लेकर बनी अनिश्चितता ने भी छात्रों और उनके परिवारों की चिंता बढ़ाई है। इसके अलावा विदेश में उच्च शिक्षा की बढ़ती लागत भी छात्रों के फैसले को प्रभावित कर रही है। ट्यूशन फीस, रहने का खर्च, यात्रा और अन्य खर्चों को मिलाकर कई छात्रों को लाखों रुपये खर्च करने पड़ते हैं। पिछले कुछ वर्षों में विदेश में पढ़ाई की कुल लागत काफी बढ़ी है, जिससे 30 से 50 लाख रुपये तक का एजुकेशन लोन लेना कई परिवारों के लिए बड़ा वित्तीय जोखिम बन गया है।
अब छात्र केवल विदेशी डिग्री को सफलता की गारंटी नहीं मान रहे हैं। वे पढ़ाई पर होने वाले खर्च के मुकाबले नौकरी, शुरुआती वेतन, करियर ग्रोथ और लोन चुकाने की क्षमता यानी रिटर्न ऑन इन्वेस्टमेंट को ज्यादा महत्व दे रहे हैं। इसी वजह से कम खर्च में बेहतर करियर विकल्प देने वाले भारतीय संस्थानों पर भी छात्रों का ध्यान बढ़ रहा है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के बाद भारत में उच्च शिक्षा के क्षेत्र में नए कोर्स, कौशल आधारित शिक्षा और बेहतर संस्थानों पर जोर बढ़ा है। इससे कुछ छात्रों को देश में ही उच्च शिक्षा हासिल करने और इसके बाद भारत में करियर बनाने का विकल्प अधिक आकर्षक लग रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार, विदेश जाने की इच्छा पूरी तरह खत्म नहीं हुई है, लेकिन छात्रों का नजरिया जरूर बदल रहा है। अब फैसला केवल विदेशी डिग्री और बेहतर लाइफस्टाइल के आधार पर नहीं, बल्कि शिक्षा की गुणवत्ता, कुल खर्च, नौकरी के अवसर और भविष्य की आर्थिक सुरक्षा को ध्यान में रखकर लिया जा रहा है। यही बदलाव भारतीय छात्रों के विदेश जाने के आंकड़ों में आई बड़ी गिरावट के पीछे महत्वपूर्ण कारणों में शामिल है।