Deprecated: Function WP_Dependencies->add_data() was called with an argument that is deprecated since version 6.9.0! IE conditional comments are ignored by all supported browsers. in /home/u141101890/domains/uttaranchalratna.com/public_html/wp-includes/functions.php on line 6260

बादल से भगवंत मान तक, पंजाब में CM चेहरे ने कैसे बदले चुनावी नतीजे?

पंजाब में विधानसभा चुनाव से पहले मुख्यमंत्री चेहरा घोषित करने की राजनीति कोई नई बात नहीं है। साल 1997 से लेकर 2022 तक के चुनावी नतीजों पर नजर डालें तो ज्यादातर प्रमुख दलों ने किसी न किसी बड़े नेता को मुख्यमंत्री पद के चेहरे के रूप में आगे रखकर चुनाव लड़ा है। हालांकि केवल मजबूत सीएम फेस होना जीत की गारंटी नहीं रहा। चुनावी सफलता के लिए मजबूत संगठन, जमीनी पकड़, सामाजिक और जातीय समीकरण, प्रमुख मुद्दे और जनता के बीच राजनीतिक माहौल भी उतना ही महत्वपूर्ण साबित हुआ है। पंजाब के चुनावी इतिहास में कई बार बड़े और लोकप्रिय चेहरे भी सत्ता विरोधी लहर के सामने कमजोर पड़ गए। वहीं कई मौकों पर मजबूत संगठन और जनता के बीच बने माहौल ने पार्टी को बड़ी जीत दिलाई। साल 1997 के विधानसभा चुनाव में शिरोमणि अकाली दल-भाजपा गठबंधन ने प्रकाश सिंह बादल को प्रमुख चेहरे के तौर पर आगे रखा था। उस समय राजनीतिक मुद्दों और मजबूत जनाधार ने गठबंधन को फायदा पहुंचाया और सत्ता पर कब्जा करने में सफलता मिली।

साल 2002 के चुनाव में भी शिअद की ओर से प्रकाश सिंह बादल प्रमुख चेहरा थे। दूसरी तरफ कांग्रेस ने कैप्टन अमरिंदर सिंह को आगे कर चुनावी मैदान में उतारा। उस समय सत्ता विरोधी माहौल कांग्रेस के पक्ष में गया और कैप्टन अमरिंदर सिंह मुख्यमंत्री बनने में सफल रहे। साल 2007 में एक बार फिर पंजाब की राजनीति बादल और कैप्टन अमरिंदर सिंह के इर्द-गिर्द केंद्रित रही। शिअद-भाजपा गठबंधन ने कांग्रेस सरकार के खिलाफ बने सत्ता विरोधी माहौल, ग्रामीण और सिख वोट बैंक तथा मजबूत संगठन के दम पर चुनावी जीत हासिल की। इसके बाद साल 2012 के विधानसभा चुनाव में प्रकाश सिंह बादल के नेतृत्व में शिअद-भाजपा गठबंधन ने लगातार दूसरी बार सत्ता हासिल की। सरकार के कामकाज, विकास कार्यों और सामाजिक समीकरणों ने गठबंधन को दोबारा जनादेश दिलाने में अहम भूमिका निभाई। साल 2017 के चुनाव में भी प्रकाश सिंह बादल और कैप्टन अमरिंदर सिंह प्रमुख राजनीतिक चेहरों के रूप में सामने थे। लेकिन 10 साल की शिअद-भाजपा सरकार के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर ने चुनावी समीकरण पूरी तरह बदल दिए।

नशा, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और सरकार के खिलाफ बढ़ती नाराजगी जैसे मुद्दे कांग्रेस के पक्ष में गए। प्रकाश सिंह बादल का व्यक्तिगत राजनीतिक कद बड़ा होने के बावजूद सरकार के खिलाफ जनता की नाराजगी शिअद-भाजपा गठबंधन पर भारी पड़ी। साल 2022 के विधानसभा चुनाव में पंजाब की राजनीति में नए समीकरण देखने को मिले। कांग्रेस ने तत्कालीन मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी को प्रमुख चेहरे के तौर पर आगे किया और दलित मुख्यमंत्री के रूप में उन्हें चुनावी अभियान का केंद्र बनाया। कांग्रेस ने ‘साड्डा चन्नी, साड्डा सीएम’ जैसे नारों के जरिए मतदाताओं तक पहुंचने की कोशिश की। लेकिन पार्टी की अंदरूनी कलह और नेतृत्व को लेकर विवादों ने कांग्रेस के चुनावी अभियान को कमजोर किया। दूसरी तरफ आम आदमी पार्टी ने भगवंत सिंह मान को प्रमुख चेहरे के रूप में आगे किया। पार्टी ने चुनाव में कई बड़े वादे और गारंटियां पेश कीं, जिनका जनता पर व्यापक असर देखने को मिला।

भगवंत मान की लोकप्रियता और आम आदमी पार्टी के चुनावी अभियान ने पंजाब में सत्ता परिवर्तन कर दिया। कांग्रेस का दलित कार्ड अपेक्षित परिणाम नहीं दे सका और आप को प्रचंड बहुमत मिला। अब पंजाब में फरवरी 2027 में प्रस्तावित विधानसभा चुनाव को लेकर एक बार फिर मुख्यमंत्री चेहरे की राजनीति चर्चा में है। सभी प्रमुख राजनीतिक दल अपनी रणनीति और नेतृत्व के समीकरणों को लेकर मंथन कर रहे हैं। आम आदमी पार्टी ने सबसे पहले अपनी स्थिति स्पष्ट कर दी है। पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल ने भगवंत सिंह मान को 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए मुख्यमंत्री चेहरा घोषित कर दिया है। कांग्रेस ने अभी तक किसी एक नेता को औपचारिक रूप से मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित नहीं किया है। पार्टी के भीतर नेतृत्व को लेकर अलग-अलग दावों और अंदरूनी खींचतान के बीच कांग्रेस सामूहिक नेतृत्व के साथ चुनाव लड़ने की रणनीति पर आगे बढ़ रही है। पंजाब कांग्रेस प्रभारी भूपेश बघेल भी संकेत दे चुके हैं कि पार्टी चुनाव सामूहिक नेतृत्व में लड़ेगी। कांग्रेस की रणनीति के अनुसार चुनाव के बाद विधायक दल और पार्टी नेतृत्व मुख्यमंत्री के नाम पर फैसला कर सकते हैं।

शिरोमणि अकाली दल की ओर से सुखबीर सिंह बादल चुनावी तैयारियों में सक्रिय हैं और उन्होंने चुनाव लड़ने की घोषणा भी की है। हालांकि पार्टी ने अभी तक आधिकारिक रूप से किसी नेता को मुख्यमंत्री पद का चेहरा घोषित नहीं किया है। भाजपा ने भी फिलहाल सामूहिक नेतृत्व के साथ चुनाव लड़ने की रणनीति अपनाई है। पार्टी की ओर से मुख्यमंत्री चेहरे को लेकर अभी अंतिम घोषणा नहीं की गई है, हालांकि पंजाब की सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियों को देखते हुए विभिन्न समीकरणों पर चर्चा जारी है। 2027 के विधानसभा चुनाव में मुख्यमंत्री चेहरा एक बड़ा मुद्दा जरूर रहेगा, लेकिन पंजाब का चुनावी इतिहास बताता है कि केवल किसी नेता की लोकप्रियता से जीत तय नहीं होती। जनता का मूड, सत्ता विरोधी लहर, संगठन की ताकत, स्थानीय मुद्दे और सामाजिक समीकरण अंतिम नतीजों को प्रभावित करने में निर्णायक भूमिका निभाते हैं। अब देखना दिलचस्प होगा कि आम आदमी पार्टी भगवंत मान के चेहरे के साथ सत्ता बचाने में सफल होती है या कांग्रेस, भाजपा और शिरोमणि अकाली दल अपनी अलग रणनीति के जरिए पंजाब की राजनीति में बड़ा बदलाव लाने में कामयाब होते हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *